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पेपर और गुड़ उद्योग में मुजफ्फरनगर देश में पहले स्थान पर है। पेपर मिलों, कोल्हुओं, लोहा उद्योग और चीनी उद्योग से जिले में एक लाख से अधिक लोगों को रोजगार मिला है। बीते 33 सालों में उद्योगों ने अधिक तरक्की की है। जिसका साक्षी अमर उजाला रहा है। इतना जरूर हुआ है कि इस बीच एक बड़ा उद्योग क्रेशर जिले से खत्म हो गए।पेपर में हम बने नंबर वन
मुजफ्फरनगर में पेपर उद्योग की शुरुआत 1974 में हुई, सबसे पहले यहां अग्रवाल पेपर मिल लगी। इसके बाद खुराना और सुपर पेपर मिल की स्थापना हुई। 1985 तक पेपर उद्योग में कोई खास तरक्की नहीं हुई, लेकिन इसके बाद यह उद्योग बढ़ता गया। शुरू में प्रारंभ हुई पेपर मिले तो बंद हो गई, लेकिन आधुनिक मशीनों के साथ नई पेपर मिलें लग गईं। पेपर उद्योग से जुड़े पंकज अग्रवाल बताते हैं कि इस समय हम पूरे देश में नंबर एक पर है। जिले में 30 पेपर मिले हैं। इन पेपर मिलों में वेस्ट मैटीरियल से पेपर बनाया जा रहा है। पेपर मिलों की एक साल में 15 लाख टन पेपर बनाने की क्षमता है। देश में छोटी पेपर मिल की शुरुआत इसी जिले से हुई। पेपर उद्योग से जिले में परोक्ष रूप से 15 हजार और अपरोक्ष रूप से 40 हजार रोजगार पा रहे हैं।

गुड़ उद्योग में भी देश में सबसे आगे

गुड़ उद्योग में मुजफ्फरनगर जिला देश में शुरू से ही नंबर एक पर है। इसे दूसरा कोई जिला आज तक पछाड़ नहीं पाया है। गुड़ कारोबारी संजय मित्तल और श्याम सिंह सैनी बताते हैं कि पूरे देश में गुड़ की सप्लाई यहीं से होती है। जिले में ग्रामीण क्षेत्र में चार हजार कोल्हू गुड़ बनाते हैं। इन कोल्हुओं पर 40 हजार लोगों को रोजगार मिला है। इसी के चलते प्रदेश सरकार ने गुड़ को जनपद एक-एक उत्पाद में शामिल किया है। एशिया की सबसे बड़ी गुड़ मंडी यहीं पर है। इसी के साथ चीनी उद्योग में जिला अपना महत्वपूर्ण स्थान रखता है। आठ चीनी मिलों में यहां गन्ना सप्लाई होता है। चीनी मिलों में भी लगभग दस हजार लोग रोजगार पा रहे हैं।

लोहा उद्योग ने दी नई पहचान
बीते 33 सालों में यहां लोहा उद्योग काफी बढ़ा है। 1980 के दशक में यहां केवल रेनबो, अरिहंत, यूपी स्टील, पालीवाल लोहा मिल थी। ये फैक्ट्री तो बंद होती चली गई, इनमें आज केवल यूपी स्टील बची है। 1985 के बाद यहां लोहा फैक्ट्री बड़ी संख्या में लगनी शुरू हुई। 1990 से 2005 तक लोहा उद्योग यहां फला फूला। यहां लोहा और स्टील की फैक्ट्री की संख्या 100 से ऊपर पहुंच गई थी। इस समय भी 50 से अधिक लोहा फैक्ट्री कार्यरत है। इनमें रोलिंग मिलों की हालत तो ठीक हैं, लेकिन इंगट फैक्ट्रियों के सामने समस्या है। कुल मिलाकर लोहा उद्योग में यहां दस हजार से अधिक लोग रोजगार पा रहे हैं।